बरखा-बहार
सुन-सुनकर बूंदों की रिमझिम, लगा बजे वीणा के तार ।
ओढ चुनरिया गर्मी भागी, ठण्डी-ठण्डी बहे बयार ।।
काले काले मेघ लगें यों, नभ में नाच रहे गजराज ।
कौंध-कौंध कर बिजली मानो, तम पर हो कर रही प्रहार ।।
मीठे बोल पपीहा बोले , मोर नाचते पंख पसार
रात में मेंढक राग अलापें , बजे झींगुरों की झंकार ।।
ओढ चुनरिया ..........................
सरिता भाग चली मिलने को , अपने प्रियतम सागर से ।
जहां भी देखो वही दिखे है, सारे जहां में प्यार ही प्यार ।।
ओढ चुनरिया ..........................
हरियाली की चादर फैली , नाच उठे सब वन उपवन ।
पेडों पर पड़ गये हैं झूले , गोरी गायें राग मल्हार ।।
ओढ . चुनरिया .........................
बम-बम भोले का जयकारा , गूंज उठा विश्व मंदिर में ।
बेलपत्र और पुष्प चढ़ाने, भक्तों की है लगी कतार ।।
जान पड़ गई है खेतों में, दमक उठा पीला सोना ।
भूमि-पुत्र का चेहरा देखों, आया है उस पर निखार ।।
ओढ . चुनरिया .........................
मधुर राग सुनकर रिमझिम का, गाये ये मतवाला मन ।
सभी की नजरें तुम्हें निहारें, स्वागत है बरखा बहार ।।
-के.पी. सिंह ‘‘फकीरा‘‘


